प्राथमिकी और पुलिस अनुसंधान प्रक्रिया के संबंध में
BNSS, 2023 द्वारा किए गए बदलाव
( Changes
made by BNSS,2023 with Respect to FIR & Police Investigation )
Prabhu Nath
Singh
Director Prosecution
(Retd)
Govt of Bihar
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) का उद्देश्य है
:
~ तेज़
न्याय सुनिश्चित करना;
~ अनुसंधान
में पारदर्शिता और जवाबदेही लाना;
~ आपराधिक न्याय प्रणाली को अधिक पीड़ित-केंद्रित बनाना( Victim-centric);
BNSS की कुछ मुख्य विशेषताएं
(a) अनुसंधान और विचारण के लिए तय समय
सीमा
-
BNSS तेज़ न्याय सुनिश्चित करने के लिए अनुसंधान और विचारण के अलग-अलग पहलुओं के लिए तय
समय-सीमाएं निर्धारित करता है।
(b) तलाशी की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग
-
BNSS अनुसंधान के दौरान अधिक पारदर्शिता लाने के लिए
तलाशी और ज़ब्ती की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग को अनिवार्य बनाता है।
(c) अनुसंधान के दौरान संपत्ति की कुर्की
-
अपराधियों की वह
संपत्ति, जिसे अपराध से अर्जित संपत्ति माना जाता है, उसे अदालत द्वारा कुर्क किया जा सकता है
। अपराध से अर्जित ऐसी संपत्ति पीड़ितों के बीच
बांटी जाएगी । इससे न केवल अपराध के प्रति अधिक भय पैदा
होगा, बल्कि अपराध के पीड़ितों को कुछ आर्थिक राहत भी
मिलेगी ।
(d) घोषित अपराधियों का उनकी अनुपस्थिति में
ट्रायल-
BNSS घोषित अपराधियों का उनकी अनुपस्थिति में ट्रायल करने का प्रावधान करता है ।
1. FIR से संबंधित बदलाव (Changes with respect to FIR)
[ धारा 173 BNSS ]
(i) अधिकार क्षेत्र की परवाह किए बिना FIR
का पंजीकरण [धारा- 173 (1) BNSS]
अधिकार क्षेत्र की
परवाह किए बिना FIR किसी भी पुलिस स्टेशन में दर्ज की जा सकती
है, चाहे अपराध किसी भी क्षेत्र में हुआ हो ।
(ii) इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से FIR
[ धारा- 173 (1) (ii) BNSS ]
FIR इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों
(E-FIR) से दर्ज की जा सकती है। हालाँकि शिकायतकर्ता को 3 दिनों के भीतर इस पर
हस्ताक्षर करने होंगे ।
(iii) प्रारंभिक जाँच करने की शर्तें [ धारा 173 (3) BNSS ]
3 वर्ष या उससे अधिक का
दंड किन्तु 7 वर्ष से कम दंड वाले अपराधों में, पुलिस स्टेशन का
प्रभारी अधिकारी -
~ पुलिस उपाधीक्षक (Deputy
Superintendent of Police) की अनुमति से,
~ यह पता लगाने के लिए
प्रारंभिक जाँच कर सकता है कि क्या मामले में आगे बढ़ने के लिए कोई प्रथम दृष्टया
(prima facie) मामला बनता है । ऐसी प्रारंभिक जाँच 14 दिनों के भीतर पूरी
की जानी चाहिए।
नोट: CrPC के तहत ऐसा कोई
प्रावधान नहीं था ।
(iv) दैनिक डायरी रिपोर्ट
मजिस्ट्रेट को भेजना [धारा 174 BNSS]
प्रभारी अधिकारी असंज्ञेय मामलों (non-cognizable
cases) से संबंधित जानकारी की दैनिक डायरी रिपोर्ट हर 14 दिन में एक बार
मजिस्ट्रेट को भेजेगा ।
नोट: CrPC के तहत इसके लिए कोई विशिष्ट समय सीमा निर्धारित नहीं थी।
2. बयान दर्ज करने से
संबंधित बदलाव
(Changes
with respect to recording of statements)
[धारा 176, 179-183 BNSS]
(i) पीड़िता का बयान उसके घर पर दर्ज करना [ धारा 176(1)(b)
BNSS]
बलात्संग के अपराध के संबंध में पीड़िता का बयान उसके
घर पर या उसकी पसंद की जगह पर एक महिला पुलिस
अधिकारी द्वारा उसके माता-पिता, अभिभावक, करीबी रिश्तेदार या
इलाके के किसी सामाजिक कार्यकर्ता की उपस्थिति में दर्ज किया जाएगा । ऐसा बयान ऑडियो-वीडियो इलेक्ट्रॉनिक
माध्यमों, जिसमें मोबाइल फोन भी शामिल है, के द्वारा भी दर्ज
किया जा सकता है ।
नोट: CrPC
में यौन उत्पीड़न की
पीड़िता का बयान मोबाइल फोन के माध्यम से दर्ज करने का कोई प्रावधान नहीं था।
(ii) पीड़िता का बयान महिला पुलिस अधिकारी द्वारा
दर्ज किया जाना [धारा 180(3)
BNSS]
यौन उत्पीड़न की पीड़िता का बयान एक महिला पुलिस अधिकारी
या किसी अन्य महिला अधिकारी द्वारा दर्ज किया जाएगा। ऐसे बयान ऑडियो-वीडियो
इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से भी दर्ज किए जा सकते हैं।
(iii) पीड़िता का बयान महिला न्यायिक मजिस्ट्रेट
द्वारा दर्ज किया जाना [Sec. 183(6a) BNSS]
धारा 183 (6) (a) यह अनिवार्य करती है
कि बलात्संग की पीड़िता का बयान केवल एक महिला न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा ही दर्ज
किया जाएगा और उनकी अनुपस्थिति में एक पुरुष न्यायिक
मजिस्ट्रेट द्वारा किसी महिला की उपस्थिति में दर्ज किया जाएगा ।
(iv) बयान दर्ज कराने के लिए पुलिस थाने में उपस्थिति
[Sec. 179 BNSS]
(a) 15 वर्ष से कम या 60 वर्ष से अधिक आयु का
कोई भी पुरुष व्यक्ति ;
(b) कोई भी महिला;
(c) कोई भी मानसिक या
शारीरिक रूप से शिथिलांग व्यक्ति;
(d) कोई भी गंभीर बीमारी
से पीड़ित व्यक्ति को ; अपना बयान दर्ज कराने के लिए पुलिस थाने में
नहीं बुलाया जाएगा । यदि उक्त व्यक्ति
पुलिस थाने में उपस्थित होने का इच्छुक है तो उसे ऐसा करने की
अनुमति दी जा सकती है।
(v) गवाह का बयान मजिस्ट्रेट द्वारा दर्ज किया
जाना [Sec. 183 (6) BNSS]
~ 10 वर्ष, आजीवन कारावास या
मृत्युदंड से दंडनीय अपराधों से संबंधित मामलों में मजिस्ट्रेट उस गवाह का
बयान दर्ज करेगा जिसे पुलिस अधिकारी उसके समक्ष प्रस्तुत करता है ।
(नोट: CrPC में इस तरह का कोई
प्रावधान नहीं था ।)
~ यदि बयान देने वाला
व्यक्ति अस्थायी या स्थायी रूप से मानसिक या शारीरिक रूप से विकलांग है तो उस व्यक्ति द्वारा
किसी दुभाषिए या विशेष शिक्षक की सहायता से दिया गया बयान ऑडियो-वीडियो
इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से और अधिमानतः मोबाइल
फोन के माध्यम से दर्ज किया जाएगा ।
3. गिरफ़्तारी (Arrest)
[धारा 35
BNSS]
(i)
बुज़ुर्ग या कमज़ोर व्यक्ति की गिरफ़्तारी [धारा 35
(7)BNSS]
3 साल से कम की सज़ा वाले अपराधों के मामले में किसी ऐसे व्यक्ति की
गिरफ़्तारी नहीं की जाएगी, जो :
~ शिथिलांग (infirm)व्यक्ति हो, या
~ 60 साल से ज़्यादा उम्र
का हो ; जब तक कि DySP
से पहले से अनुमति न
ले ली जाए ।
(ii)
गिरफ़्तार लोगों का रिकॉर्ड रखने के लिए पुलिस अधिकारी की नियुक्ति [धारा 37
(b)BNSS]
प्रत्येक जिला और प्रत्येक पुलिस स्टेशन में ASI
से कम रैंक का न होने
वाला एक अधिकारी 'नामित पुलिस अधिकारी'(Designated
Police Officer) के तौर पर नियुक्त किया जाएगा। यह अधिकारी गिरफ़्तार किए
गए व्यक्ति के नाम, पते और अपराध की प्रकृति से जुड़ी जानकारी
को डिजिटल रूप में पुलिस स्टेशन और ज़िला मुख्यालय में रखेगा और दिखाएगा।
(iii)
नामित पुलिस
अधिकारी को गिरफ़्तारी की जानकारी देना [धारा 48 BNSS]
गिरफ़्तारी करने वाले पुलिस अधिकारी के लिए यह ज़रूरी है
कि वह गिरफ़्तार किए गए व्यक्ति के बारे में :
(a) उसके रिश्तेदारों या
दोस्तों को, और
(b) साथ ही नामित पुलिस
अधिकारी को भी जानकारी दे ।
(iv)
प्राइवेट व्यक्ति द्वारा
गिरफ़्तारी [धारा 40 BNSS]
अगर कोई प्राइवेट व्यक्ति किसी को गिरफ़्तार करता है तो गिरफ़्तार किए गए व्यक्ति को गिरफ़्तारी के 6 घंटे के अंदर पुलिस के हवाले करना ज़रूरी है ।
(v) कुछ मामलों में हथकड़ी
का इस्तेमाल करने की अनुमति [धारा 43 (3) BNSS]
पुलिस अधिकारी अपराध की प्रकृति और गम्भीरता
को ध्यान में रखते हुए हथकड़ी का प्रयोग कर सकता है जब –
~ अगर वह आदतन अपराधी हो
या बार-बार अपराध करता हो, या
~ अगर कोई व्यक्ति पुलिस
हिरासत से भाग गया हो, या
~ अगर मामला संगठित अपराध, आतंकवादी गतिविधि, नशीले पदार्थों से जुड़े अपराध, हथियारों और गोला-बारूद का अवैध कब्ज़ा, हत्या, बलात्कार, तेज़ाब से हमला, सिक्कों और नोटों की जालसाज़ी, मानव तस्करी, बच्चों के ख़िलाफ़ यौन अपराध, या देश के ख़िलाफ़ अपराध का हो।
4. मेडिकल जाँच (Medical Examination)
[धारा 51 से 53,
184 BNSS]
(i) पुलिस अधिकारी द्वारा
मेडिकल जाँच के लिए आवेदन [धारा 51 और 52
BNSS]
कोई भी पुलिस अधिकारी आरोपी की मेडिकल जाँच के लिए आवेदन
कर सकता है।
(ii) बलात्कार के मामलों में पीड़िता की मेडिकल
रिपोर्ट [धारा 184(6) BNSS]
मेडिकल अधिकारी / रजिस्टर्ड चिकित्सा व्यवसायी 7 दिनों की अवधि के
भीतर मेडिको-लीगल रिपोर्ट (MLR) अनुसंधान अधिकारी को
भेजेगा । अनुसंधान अधिकारी इसे
पुलिस रिपोर्ट के साथ मजिस्ट्रेट को भेजेगा ।
(iii) आरोपी की मेडिकल जाँच रिपोर्ट [धारा 52
BNSS]
मेडिकल अधिकारी / रजिस्टर्ड चिकित्सा व्यवसायी बिना किसी देरी के आरोपी की मेडिको-लीगल रिपोर्ट अनुसंधान अधिकारी को भेजेगा।
5. रिमांड ( Remand )
[ धारा 187 (2) BNSS ]
पुलिस रिमांड (Police Remand)
पुलिस रिमांड गिरफ्तारी के शुरुआती 15 दिनों के बाद भी
मांगी जा सकती है । BNSS
के तहत आरोपी की पुलिस रिमांड मांगी जा सकती है :
~ गिरफ्तारी के पहले 40 दिनों के भीतर, उन मामलों में जहाँ
अपराध के लिए 10 साल से
कम दंड की सज़ा है।
~ गिरफ्तारी के पहले 60 दिनों के भीतर, उन मामलों में जहाँ
अपराध के लिए 10 साल से
ज़्यादा दंड की सज़ा है ।
नोट: CrPC के तहत आरोपी की पुलिस रिमांड केवल गिरफ्तारी के बाद के शुरुआती 15 दिनों के दौरान ही मांगी जा सकती थी ।
6. तलाशी के संबंध में
बदलाव (Changes
with respect to Search )
[धारा 103, 105, 185, 186 BNSS]
BNSS ने CrPC
की तुलना में तलाशी की
कार्यवाही के संबंध में बड़े बदलाव किए हैं। इसने तलाशी की पूरी प्रक्रिया की
ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य कर दी है। तलाशी करते समय प्रक्रिया का पालन
किया जाना चाहिए । स्वयं तलाशी के लिए
जाने और अधीनस्थ पुलिस अधिकारी को तलाशी के लिए नियुक्त करने से पहले की कार्रवाई -
(a) केस डायरी में तलाशी के कारणों को दर्ज करना ; [धारा 185 (1) BNSS] :
पुलिस स्टेशन के प्रभारी अधिकारी या IO
को तलाशी करने के अपने
विश्वास के आधारों को दर्ज करना आवश्यक है, और साथ ही केस डायरी
में स्वयं तलाशी न करने का कारण भी दर्ज करना होगा।
(b) स्वयं तलाशी करना ; [धारा 185 (2) BNSS] :
पुलिस स्टेशन के प्रभारी अधिकारी या IO
यदि संभव हो तो स्वयं तलाशी करेंगे ।
(c) तलाशी के लिए अधीनस्थ पुलिस अधिकारी को
नियुक्त करना; [धारा 185 (3) BNSS]:
यदि पुलिस स्टेशन के प्रभारी अधिकारी या IO
स्वयं तलाशी करने में
असमर्थ हैं तो वे कारणों को दर्ज करने के बाद तलाशी करने के लिए
किसी भी अधीनस्थ पुलिस अधिकारी को नियुक्त कर सकते हैं।
(d) तलाशी और जब्ती की
रिकॉर्डिंग [धारा 105 और धारा 185
(2) BNSS का परंतुक] -
पुलिस स्टेशन के प्रभारी अधिकारी या IO
तलाशी की पूरी
प्रक्रिया को किसी भी ऑडियो-वीडियो इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से, अधिमानतः मोबाइल फोन
द्वारा रिकॉर्ड करेंगे । तलाशी दो स्वतंत्र
गवाहों की उपस्थिति में की जाएगी [धारा 103 (4)BNSS]
BNSS की धारा 103
(4) के अनुसार तलाशी करने से पहले पुलिस अधिकारी को उस
इलाके के दो या अधिक स्वतंत्र और प्रतिष्ठित निवासियों को बुलाना आवश्यक है, जहाँ तलाशी की जाने
वाली जगह स्थित है। तलाशी के लिए गवाह बनने से इनकार करना एक अपराध है [धारा 103(8)
BNSS].
कोई भी व्यक्ति जो बिना किसी उचित
कारण के इस धारा के तहत तलाशी में शामिल होने और
गवाह बनने से इनकार करता है या उपेक्षा करता है, जब उसे लिखित आदेश
द्वारा ऐसा करने के लिए बुलाया जाता है तो यह माना जाएगा कि
उसने भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 222 के तहत अपराध किया
है।
(e)DM, SDM या JMFC को तलाशी रिकॉर्डिंग भेजना [धारा 105
BNSS]
~ पुलिस अधिकारी बिना किसी देरी के
ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग जिला मजिस्ट्रेट, उपखंड
मजिस्ट्रेट या प्रथम
वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट (JMFC) को भेजेगा ।
~ IO तलाशी से संबंधित
रिकॉर्ड 48 घंटों के भीतर मजिस्ट्रेट को भेजेगा;[धारा 185(5)]
~ IO निम्नलिखित रिकॉर्ड की
प्रतियां 48 घंटों के भीतर सक्षम मजिस्ट्रेट को भेजेगा:
(a) तलाशी लेने के कारण;
(b) स्वयं तलाशी न लेने और
किसी अधीनस्थ पुलिस अधिकारी को नियुक्त करने का कारण;
(यदि IO
द्वारा तलाशी लेने के
लिए किसी अन्य व्यक्ति को नियुक्त किया गया हो);
(c) तलाशी की कार्यवाही का विवरण;
7. संपत्ति की कुर्की, ज़ब्ती या बहाली
(Attachment,
Forfeiture or Restoration of Property)
[धारा 107 BNSS]
BNSS अपराधियों की उस
संपत्ति की कुर्की के लिए जो आपराधिक गतिविधि से
हासिल की गई है और उसके वितरण के लिए निम्नलिखित प्रक्रिया
निर्धारित करता है :
आपराधिक गतिविधि से बनी संपत्ति की कुर्की [धारा 107
(1) BNSS]
अनुसंधान अधिकारी, पुलिस अधीक्षक या
पुलिस आयुक्त की मंज़ूरी से सक्षम मजिस्ट्रेट के
सामने उस संपत्ति की कुर्की के लिए आवेदन कर सकता है जो आपराधिक गतिविधि से या
किसी अपराध को करने से हासिल की गई हो।
मजिस्ट्रेट द्वारा कारण बताओ नोटिस [धारा 107
(2) BNSS]
मजिस्ट्रेट उस व्यक्ति को नोटिस जारी कर सकता है, जिसकी वह संपत्ति है और उससे 14 दिनों के भीतर यह
कारण बताने के लिए कह सकता है कि उसकी संपत्ति की कुर्की का आदेश क्यों न दिया जाए ।
अपराध से हासिल संपत्ति की कुर्की का आदेश [धारा 107
(4) BNSS]
मजिस्ट्रेट संबंधित सभी पक्षों की
सुनवाई के बाद उस संपत्ति की कुर्की का निर्देश दे सकता है
जो अपराध से हासिल संपत्ति पाई जाती है।
संपत्ति की कुर्की के लिए एकतरफ़ा अंतरिम आदेश [धारा 107
(5) BNSS]
यदि मजिस्ट्रेट की यह राय है कि कुर्की के लिए संपत्ति
के मालिक को नोटिस जारी करने से कुर्की या ज़ब्ती का उद्देश्य ही विफल हो जाएगा तो वह संपत्ति की
कुर्की के लिए एकतरफ़ा अंतरिम आदेश पारित कर सकता है।
अपराध से हासिल संपत्ति का पीड़ितों के बीच आनुपातिक वितरण [धारा 107
(6) BNSS]
यह तय हो जाने पर कि विचाराधीन संपत्ति अपराध से हासिल
संपत्ति की श्रेणी में आती है, मजिस्ट्रेट जिला
मजिस्ट्रेट को निर्देश देगा कि वह उस संपत्ति को उन लोगों के बीच आनुपातिक रूप से
वितरित करे जो उस अपराध से प्रभावित हुए थे ।
जिला मजिस्ट्रेट द्वारा की जाने वाली कार्रवाई [धारा 107
(7) BNSS]
जिला मजिस्ट्रेट 60 दिनों की अवधि के भीतर
अपराध से हासिल संपत्ति का वितरण या तो स्वयं करेगा, या अपने अधीन किसी
अन्य अधिकारी को ऐसा वितरण करने के लिए अधिकृत करेगा।
8. मृत्यु समीक्षा रिपोर्ट (Inquest Report)
[धारा 194 – 196 BNSS]
(i) मृत्यु समीक्षा रिपोर्ट SDM
को भेजना [धारा 194 (1) BNSS]
मृत्यु समीक्षा रिपोर्ट (Inquest Report) पर प्रभारी अधिकारी / IO और अन्य व्यक्तियों के हस्ताक्षर होंगे और इसे पुलिस द्वारा 24 घंटे के भीतर जिला
मजिस्ट्रेट या उपखंड मजिस्ट्रेट को
भेजा जाएगा ।
नोट: CrPC में इसके लिए कोई
विशिष्ट समय-सीमा निर्धारित नहीं थी।
(ii) मृत्यु समीक्षा के उद्देश्य से किसी व्यक्ति
को समन करने की शक्ति [धारा 195 BNSS]
मृत्यु समीक्षा की कार्यवाही के उद्देश्य से 15 वर्ष से कम आयु या 60 वर्ष से अधिक आयु के किसी पुरुष, या किसी महिला, या मानसिक या शारीरिक रूप से अक्षम व्यक्ति, या किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को उस स्थान के अलावा किसी अन्य स्थान पर उपस्थित होने की आवश्यकता नहीं होगी जहाँ वह व्यक्ति निवास करता है। यदि ऐसा व्यक्ति पुलिस स्टेशन में उपस्थित होने का इच्छुक है तो उसे ऐसा करने की अनुमति दी जा सकती है ।
9. पुलिस रिपोर्ट (Police Report)
[धारा 193 BNSS]
(i) यौन अपराधों के मामलों
में अनुसंधान 2 महीने के भीतर [धारा 193 BNSS] ;
भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 64,
65, 66, 67, 68, 70, 71 के तहत या यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम,
2012 की धारा 4, 6, 8 के तहत किसी अपराध के संबंध में अनुसंधान उस तारीख से 2 महीने के भीतर पूरी
की जाएगी जिस तारीख को पुलिस स्टेशन के प्रभारी अधिकारी द्वारा जानकारी दर्ज की गई
थी।
(ii) पुलिस रिपोर्ट की प्रतियां [ धारा 193
(8) BNSS ]
अनुसंधान अधिकारी (IO) मजिस्ट्रेट को इलेक्ट्रॉनिक
माध्यम से पुलिस रिपोर्ट की प्रतियां उपलब्ध कराएगा [धारा 193(8)
BNSS] । अनुसंधान अधिकारी पुलिस रिपोर्ट की
प्रतियां अन्य दस्तावेजों के साथ उचित रूप से अनुक्रमित
(indexed) करके मजिस्ट्रेट को प्रस्तुत करेगा । मजिस्ट्रेट इन
दस्तावेजों को धारा 230 BNSS के तहत आवश्यकतानुसार आरोपी और पीड़ित को
उपलब्ध कराएगा । इलेक्ट्रॉनिक संचार के
माध्यम से भेजी गई पुलिस रिपोर्ट और अन्य दस्तावेजों को विधिवत तामील (duly
served) माना जाएगा ।
10. पीड़ित-केंद्रित
प्रावधान ( Victim-centric Provisions)
[धारा 193 BNSS]
(i) IO (अनुसंधान अधिकारी) 90 दिनों के भीतर पीड़ित
को अनुसंधान की प्रगति के बारे में सूचित करेगा [धारा 193
(3) (ii) BNSS] ;
पुलिस अधिकारी 90 दिनों की अवधि के
भीतर किसी भी माध्यम से (जिसमें इलेक्ट्रॉनिक संचार भी शामिल
है ) सूचक या पीड़ित को अनुसंधान
की प्रगति के बारे में सूचित करेगा ।
(ii) आगे की जांच 90 दिनों के भीतर पूरी
की जाएगी [धारा 193 (9) BNSS]
मुकदमे के दौरान आगे का अनुसंधान मामले की सुनवाई कर
रही अदालत की अनुमति से की जा सकती है और इसे 90 दिनों की अवधि के
भीतर पूरा किया जाएगा । इस अवधि को अदालत की
अनुमति से बढ़ाया जा सकता है ।
(iii) अभियोजन वापस लेने से पहले पीड़ित की बात
सुनी जाएगी [धारा 360 BNSS]
कोई भी अदालत, पीड़ित को सुनवाई का अवसर दिए बिना, अभियोजन वापस लेने की अनुमति नहीं देगी।
11. लोक सेवक और अन्य
लोगों के खिलाफ शिकायत मामले में प्रक्रिया
(Procedure in case of complaint case against
Public Servant and others)
[धारा 175 BNSS]
(i) लोक सेवक के खिलाफ शिकायत में मजिस्ट्रेट की
शक्ति [धारा 175 (4) BNSS]
मजिस्ट्रेट, किसी लोक सेवक के
खिलाफ उसकी सरकारी ड्यूटी से संबंधित शिकायत पर इन बातों के बाद
संज्ञान ले सकता है :
~ उस अधिकारी के वरिष्ठ
अधिकारियों से घटना के तथ्यों और परिस्थितियों के बारे में
रिपोर्ट प्राप्त करने
के बाद, और
~ उस लोक सेवक द्वारा
किए गए दावों पर विचार करने के बाद ।
(ii) जांच का आदेश देने से पहले मजिस्ट्रेट
पुलिस अधिकारी की सुनना [धारा 175
(3) BNSS]
मजिस्ट्रेट, शिकायत मामलों में
जांच का आदेश देने से पहल पुलिस अधिकारी द्वारा
प्रस्तुत बातों पर विचार कर सकता है।
12. त्वरित विचारण (Speedy Trial)
(i) उद्घोषित अपराधी (Proclaimed Offender) का अनुपस्थिति में
विचारण [धारा 356 BNSS]
~ BNSS ने उद्घोषित अपराधी
का अनुपस्थिति में विचारण करने का प्रावधान पेश किया है। यह अभियुक्त की
अनुपस्थिति में विचारण और निर्णय सुनाने की अनुमति देता है जिसका प्रावधान CrPC
के तहत नहीं था।
~ BNSS की धारा 356 न्यायालय को यह आदेश
देती है कि वह अनुपस्थिति में विचारण आगे बढ़ाए जब कोई व्यक्ति जिसे उद्घोषित
अपराधी (Proclaimed
Offender) घोषित किया गया है, विचारण से बचने के लिए
फरार हो गया हो और उसे गिरफ्तार करने की कोई तत्काल संभावना
न हो। यह विचारण शुरू करने से पहले आरोप तय करने की तारीख से नब्बे (90)
दिनों की अनिवार्य
प्रतीक्षा अवधि भी निर्धारित करती है।
नोट: CrPC ने धारा 299 के तहत अभियुक्त की
अनुपस्थिति में साक्ष्य दर्ज करने की अनुमति थी लेकिन उद्घोषित
अपराधी (Proclaimed
Offender) के खिलाफ विचारण पूरा करने या निर्णय सुनाने का प्रावधान
नहीं किया था।
(ii) 60 दिनों के भीतर आरोप तय करना [धारा 263
BNSS]
मजिस्ट्रेट आरोप पर पहली सुनवाई की तारीख से 60 दिनों की अवधि के
भीतर अभियुक्त के खिलाफ आरोप तय करेगा।
(iii) 45 दिनों की अवधि के भीतर निर्णय [धारा 392
BNSS]
विचारण समाप्त होने के बाद निर्णय बाद के किसी
समय सुनाया जाएगा, लेकिन 45 दिनों से अधिक समय
बाद नहीं ।
(iv) 30 दिनों की अवधि के भीतर सत्र न्यायालय
द्वारा निर्णय [धारा 258 BNSS]
अभियोजन और बचाव पक्ष की बहस सुनने के बाद सत्र न्यायालय 30 दिनों की अवधि के
भीतर अपना फैसला सुनाएगा, जिसे 45 दिनों तक बढ़ाया जा
सकता है।
(v) ऑडियो-वीडियो इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से गवाह
की परीक्षा [धारा 265 BNSS]
विचारण के दौरान अभियोजन पक्ष के
गवाहों के बयान ऑडियो-वीडियो इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से दर्ज किए जा सकते हैं ।
(vi) 120 दिनों में अभियोजन की मंजूरी [धारा 218
BNSS]
धारा–218 तहत केंद्र या राज्य सरकार को किसी लोक सेवक पर मुकदमा चलाने की मंज़ूरी के अनुरोध पर 120 दिनों के भीतर निर्णय लेना अनिवार्य है। यदि संबंधित सरकार ऐसा करने में विफल रहती है, तो यह मान लिया जाएगा कि सरकार द्वारा मंज़ूरी प्रदान कर दी गई है ।
अन्य बदलाव (Other Changes)
(i) जघन्य अपराधों की जाँच में फोरेंसिक सहायता [धारा 176
(3) BNSS]
BNSS की धारा 176
(3) यह अनिवार्य करती है कि 7 साल या उससे ज़्यादा
की सज़ा वाले अपराधों के लिए अपराध स्थल पर एक
फोरेंसिक विशेषज्ञ द्वारा फोरेंसिक सबूत इकट्ठा किए जाएँ। इस प्रावधान को 5 साल के भीतर लागू
किया जाना है, जिस दौरान राज्य सरकार द्वारा ऐसी क्षमता
विकसित की जाएगी । राज्य सरकार तब तक
किसी अन्य राज्य की फोरेंसिक सुविधा का उपयोग करने के संबंध में भी अधिसूचना जारी
करेगी जब तक कि राज्य स्वयं ऐसी सुविधा विकसित नहीं कर लेता ।
(ii) गिरफ्तार व्यक्तियों को मुआवज़ा
(दुर्भावनापूर्ण गिरफ्तारी) [धारा 360 BNSS]
जब भी कोई व्यक्ति किसी पुलिस अधिकारी से किसी अन्य
व्यक्ति को गिरफ्तार करवाता है और यदि मामले की सुनवाई
करने वाले मजिस्ट्रेट को यह प्रतीत होता है कि ऐसी गिरफ्तारी करवाने का कोई
पर्याप्त आधार नहीं था तो मजिस्ट्रेट उस व्यक्ति को, जिसने गिरफ्तारी करवाई
थी, उस गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को एक हज़ार रुपये से अधिक
का नहीं, ऐसा मुआवज़ा देने का आदेश दे सकता है ।
(iii) विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट [धारा 15
BNSS]
पुलिस कमिश्नरेट क्षेत्र में, कम से कम पुलिस
अधीक्षक (SP) रैंक के अधिकारी को विशेष कार्यकारी
मजिस्ट्रेट के रूप में नियुक्त किया जा सकता है।
नोट: CrPC
के तहत
Dy.S.P./A.C.P. रैंक के अधिकारी को विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के रूप
में नियुक्त किया जा सकता था।
(iv) इलेक्ट्रॉनिक संचार के माध्यम से समन की
तामील [धारा 64 (2) BNSS]
समन की तामील इलेक्ट्रॉनिक संचार के माध्यम से भी की जा
सकती है।
(v) दस्तावेज़ या अन्य चीज़ें पेश करने के लिए
समन [धारा 94 BNSS]
BNSS की धारा - 94 के तहत कोई भी न्यायालय या
पुलिस थाने का प्रभारी अधिकारी इलेक्ट्रॉनिक संचार (संचार उपकरण सहित) को पेश करने
की माँग कर सकता है जिसमें डिजिटल सबूत होने की संभावना हो ।
नोट: CrPC में इलेक्ट्रॉनिक
रिकॉर्ड को समन करने का कोई प्रावधान नहीं था।
(vi) अनुसंधान का काम DySP
को सौंपना [धारा 175 (1) BNSS]
पुलिस अधीक्षक अपराध की प्रकृति और
गंभीरता पर विचार करने के बाद पुलिस उपाधीक्षक (DySP)
को अपराध का अनुसंधान
करने का निर्देश दे सकता है ।
XXXXX
Note : प्रकाशित सामग्री भारत सरकार के विभिन्न विभागों के द्वारा प्रकाशित अधिसूचनाओं के आधार पर तैयार की गई है। यह UPSC/ UPPSC/ BPSC/ MPPSC/ RPSC/ JPSC/UKPSC के प्रतियोगियों के लिए अत्यंत उपयोगी है ।
Abhishal
Current Law GS
By : Abhishal Prakashan , Prayagraj
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें